Posts

मुझसे अब मेरे हालात ना पूछा करो

मुझसे अब मेरे हालात ना पूछा करो ऐसे ही, बस यूं ही ना पूछा करो तुम बस तकल्लुफ़ करके चले जाओगे और हमें फिर से सवालो मे छोड़े जाओगे मुझसे अब मेरे हालात ना पूछा करो कि शायद तुम सच सुनना ना चाहो और मैं इसी इंतज़ार में जी रहा हूँ  कि कोई एक बार हमसे हमारे हाल पूछ ले मुझसे अब मेरे हालात ना पूछा करो कि क्या जवाब दूँ, इस सोच मे उम्र गुज़र जाए कि कैसे कह दूँ तुम्हें कि मेरा रक़ीब मेरी ज़िंदगी जी रहा है और उसके पहलू में तुम हँस कर ये सवाल किए जाते हो मुझसे अब मेरे हालात ना पूछा करो कि किस्मत से अब हमने समझौता कर लिया है कि वो नाकामी कि चादर ओढ़ कर हमें सोने देगा और सच से हमें रु-ब-रु ना होना होगा

किसी और जनम में

किसी और जनम में किसी और जहाँ में मुझे पता है तुम मेरे हो   जहाँ ना सरहदें हैं ना हदें हैं हैं तो बस मैं और तुम   किसी और जनम में किसी और जहाँ में ना बंदिशें होंगी ना आज़माइशें होंगी   जहाँ मुनासिब अल्फ़ाज़ होंगे जहाँ मुख्लिस अंदाज़ होंगे और होंगे सुनाने को कई किस्से और रोकने को होंगी नहीं समाज की ये बेड़ियाँ   जहाँ मैं शायद इतना बिला-तकल्लुफ़ हूँ की खुद के जज़्बातों से रु-ब-रु हूँ जहाँ मैंने खुद से खुद को पर्दा नहीं किया जहाँ मैंने तुम्हें रुसवा नहीं किया   किसी और जनम में किसी और जहाँ में मैं शायर नहीं हूँ की उस जनम में उस जहाँ में मैं इतना बदनसीब भी नहीं हूँ

हम अकेले रह जाएंगे

एक रोज़ नई सुबह होगी और हम अकेले रह जाएंगे मने एकदम अकेले नही होंगें बस सब अपनी-अपनी डगर पकड़ लेंगें कोई करियर को लेकर कोई लेकर परिवार को कोई बाल-बच्चों में लीन कोई लेकर व्यापार को और हम भी खोजेंगे खुद को व्यस्त रखने वाले उपाय कभी किताब के पन्ने पलटेंगे कभी बना लेंगे एक कप चाय लेकिन बात करने को कोई ना होगा और करनी भी क्यों है सबके अपने मसले हैं सबके अपने पचड़े हैं खुद को ही वो संभाल ले ये क्या कुछ कम है जो उन्हें आकर सँवारनी पड़े हमारी ज़िंदगी भी समेटना पड़े हमारे बिखरे टुकड़े भी कुछ दस-बीस साल काटने होंगे कुछ जागती रातें बितानी होंगी कुछ और किताब पढ़ लेंगे कुछ रेडियो पे धुन चलानी होंगी

मेरा मन भागे चले है

मेरा मन भागे चले है  और मैं चला उसके पीछे उसे रोकने कभी इस डाल, कभी उस पात कभी सपने बुने ये भाँत-भाँत मैं पूछूँ इससे कि मन मेरे तू चाहे है क्या किस उलझन को है तू सुलझाने चला ये मुस्कुरा के बोले कि सब चाहिए अरे देखो कैसा बावला है मेरा मन किसी एक मकां में रहता नहीं किसी एक मुक़ाम पे टिकता नहीं कभी चाहे है कुबेर बने कभी चाहे बने भगवान कभी चाहे है समय को रोक ले नित नए बुने ये अरमान कभी चाहे ये ज़मीं इसकी हो और चाहे हो इसका आसमाँ कभी चाहे सब नतमस्तक हो सामने कभी चाहे जीत ले ये जहाँ अरे पूछ बावरे मुझसे भी कि मैं क्या चाहूं तेरे से जान ले कि मेरी तरज़ीह किसमे जो तेरे चाह बथेरे हैं मैं माँगता नही सब कुछ और किस्मत से ज़्यादा भी किसे क्या मिले है बस खुद को पा लूं मैं और हंसु जो ये दिन गिने-चुने हैं और चाहूँ तुझे समझाने को कि इतना क्यों व्याकुल है तू जो तू चाहे है सब कुछ ये चाहत एक भूल है, सुन सिकंदर को भी कहाँ सब कुछ था मिल पाया तो फिर तू क्यों चाहे है ये सब माया थोड़ा धीरज धर, थोड़ा खुद को टटोल थोड़ा खोज क्यों सुबकता है तू आकांक्षाओं के पीछे क्यों सिहरता है तू विफलताओं के पीछे जब है यहाँ चार दिन त...

क्या होता अगर हम ना मिले होते तो

क्या होता अगर हम ना मिले होते तो क्या होता बस 'हाय-हेलो' तक ही बातें होती हमारी क्या होता अगर साथ ना मुस्कुराते तो क्या होता अगर राहें ना जुड़ती हमारी क्या होता आँखे चार ना होती क्या होता अगर बातें ना चलती हमारी क्या होता अगर हम किरदार ना होते और क्या होता अगर कहानी ना बनती हमारी ना जान पाते तुम्हें हम ना हमें तुम जान पाते ना मौका मिलता फिर से एक बार जीने का ना मौका मिलता खुद को किसी से बाँटने का ना संयोग बनता इस दिल के फिर से धड़कने का ना संयोग बनता आईने में खुद को एक बार और देखने का और क्या हो गया जो तुम पूरे ना मिले हमें ऐसा तो नही की तुम बने ही नही हमारे तुम हमारी कविता बने तुम हमारी कहानी बने तुम पर हमने शेर लिखे और तुम हमारी शायरी बने तुम्हारा होना भले ही क्षणिक हो मेरी ज़िंदगी में और शायद मेरा होना तुम्हें बेमानी लगे मगर हम भी लिखारी हैं हम भी शब्दों के खिलाड़ी हैं किसी और से तुम मिलते तो शायद कुछ ना होता हमसे जो मिले हो तो कुछ अलग कर देंगे शब्दों में पिरो तुम्हें अमर कर देंगे और शायद ये कहानी तुम खुद भी लिख लेते पर शायद दुनिया को तुम्हें मेरे अल्फ़ाज़ों से ही रु-ब-रु होना था ...

काफ़ी रहा नहीं मैं

कभी वक़्त से जीता नहीं मैं कभी हालातों से भिड़ा नहीं मैं कभी बन्दिशों को तोड़ा नहीं, और  शायद कभी काफ़ी रहा नहीं मैं हसरतें भरी थी आँखों में और ख़्वाब सजाने से रुका नहीं मैं कभी अहम लम्हों में अलफ़ाज़ ने साथ छोड़ा और कभी काफ़ी रहा नहीं मैं कतरा-कतरा बिखरा भी था मैं ज़र्रा-ज़र्रा टूटा भी था मैं उन कतरों को समेटने में नाकाम मैं जाना कि शायद अभी काफ़ी रहा नहीं मैं वो होंठों का मिलना, तुम और मैं वो साँसों का घुलना, तुम और मैं वो रूहों के जुड़ने पर ख़ुदा राज़ी नहीं था या फिर शायद काफ़ी रहा नहीं मैं उन ख़्वाबों की ताबीर कर हमारी चाहतों की तामीर कर या तो वो लम्हें, वो यादें ही सराब हैं या कभी काफी रहा नहीं मैं ख़लिश को खुद पर ओढ़ता मैं अब ख़ुश्क ही खुश रहता मैं जी तो लूँ इकहरा भी, पर शायद खुद के लिए भी अब काफ़ी रहा नहीं मैं

ये रास्ते थोड़े परेशान हो रखे हैं

पल-पल सीने में हलचल बढ़ती है कहीं पर इंतज़ार की बाती जलती है खुद की परछाई देख ही अब सिहर उठते हैं ये रास्ते थोड़े परेशान हो रखे हैं।  कहीं शोर, कहीं सिर्फ़ कोलाहल सुनाई देता पुकारने पर भी कोई किसी की सुध नहीं लेता भीड़ में सब यहाँ अकेले खड़े हैं ये रास्ते थोड़े वीरान हो रखे हैं।  शहर अब ये पहचाना नहीं जाता समझ में किसी के ये तमाशा नहीं आता सब ने चमड़ों के मुखौटे लगा रखे हैं ये रास्ते थोड़े से अंजान हो रखे हैं।  शहर जलता है तो जलने देते हैं नफ़रतों को अक्स पर पलने देते हैं जलन से ज्वलन के जज़्बात समेटे रखते हैं ये रास्ते थोड़े हैवान हो रखे हैं।  रह-रह कर इंसानियत की सड़ांध उठती है दरख्तों की भी यहाँ सांसें घुटती है जो ज़िंदा हैं वो भी बुत बने खड़े हैं ये रास्ते मसान हो रखे हैं।  अब कहाँ अर्ज़ी दें, कहाँ फरियाद करें कोई क्यों किसी की यहाँ परवाह करे खुदगर्ज़ी के मंज़र यहाँ आम हो रखे हैं ये रास्ते थोड़े परेशान हो रखे हैं।  इस कविता के शीर्षक का श्रेय मैं अपने मित्र गौतम भास्कर को देता हूँ। एक दिन शहर से लौटते वक़्त गाड़ियों की तीव्र आवाजाही से सचेत करते हुए उसने यह वाक्य कहा था। मै...