अमान

मेरी नज़रें तुम्हारी नज़रों को
खोजती हैं, टटोलती हैं
की देख लो एक मर्तबा मेरी ओर भी
ज़ुबाँ तो मेरी काठ की है, बस निगाहें ही बोलती हैं

पश्मीना सी कोमल तुम्हारी ज़ुल्फें
इनमे ग़ुम हो जाने की ख्वाहिश जगाती हैं
इनकी छांव में ज़िन्दगी गुज़र लूँ
की किरण-ए-शम्स भी इनसे शर्माती है

और सात समंदर तर मैं लूँ
ये भवसागर भी पार करूँ
मगर पार करूँ मैं कैसे
तुम्हारे कपोलों के इन भंवर को
ये जान पड़े तो इफ्तार करूँ

और ये सब ऐतबार कर सकूं तुमसे मैं
इस बात की शुजात कहाँ से लाऊँ
की होंठ सील जाते सामने तुम्हारे
बस इज़हार-ए-अबसार से जताऊं

बेशक़ इन हाथों की सिलवटों में
शायद तुम्हारा नाम न हो
मगर जब तक मुमकिन हो
रूह में मेरे बनकर तुम अमान रहो

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