उधेड़बुन

घंटों ताकते रहता हूँ कोरे काग़ज़ को
और वो मुझे देखते रहती
की स्याही की एक लकीर खींच दूं
एक अक्षर लिख दूं
की एक शुरुआत करूं
वापस लिखने की

एक अरसा हो गया
कुछ बातचीत किये हुए
एक उम्र गुज़र गई
कुछ शोर मचाये हुए

उधर घड़ी की सुइयां
अपनी रफ्तार से चलती रहती
और मैं विचारों के धुंध से
कोशिश करता हूं शब्द बीनने की
की छन्दों के तार में
पिरो कर तुमको एक नई कहानी सुनाऊ

लेकिन कलम ठोड़ी पे टिकी रहती
और कलम की स्याही सूखती जाती है
और जो कुछ शब्द छान के निकाले थे
वो वापस विचारों में घुलने लगते हैं

मैं बदहवास से भागता उनके पीछे,
एक असफल कोशिश करता हूँ
उनको वापस लाने की
मगर बंद मुट्ठी में रेत की माफ़िक़
वो निकल जाते हैं
और रह जाती है ज़ेहन में
फिर वही कोलाहल, वही आक्रोश
जिसको व्यक्त करने के लिए
सोचता हूँ किसी और दिन
एक और कोशिश करूंगा।
किसी और दिन...

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