अनमना शहर

अनमना सा, अलसाया सा, अंगड़ाता शहर

छोटे से स्टेशन के समीप खड़ा औंघता शहर

सँकरे रास्तों और गलियों में उलझता शहर

अरमानों के उफ़ान पर बढ़े चलता शहर

 

अंधी इस दौड़ में पीछे छूटता शहर

खाली होते घरौंदों में टूटता शहर

खुद ही की ठोकर से चोट खाता शहर

खुद की ही आंसुओं का मरहम लगाता शहर

 

वो उन दिनों की यादों में जीता शहर

स्टील के टिफ़िन में दिन बिताता शहर

संदली सी शामों में घर लौटता शहर

वो खामोशी की चादर को खुद पर ओढ़ता शहर

 

धुंध के लिबास में नींदें तोड़ता शहर

सर्दियों के अलाव में किस्से सुनाता शहर

गर्मियों में पड़ोसियों के आम चुराता शहर

शरद में बसंती हिलोरें मारता शहर

 

साँसों की कसौटी पर खुद को तराशता शहर

खुद में ही खुद को तलाशता शहर

चमचमाती लाइटों में खुद को खोता शहर

मेरा अनमना सा, अलसाया सा, अंगड़ाता शहर

Comments

  1. Likhtey rahey. Badhiya.

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  2. Khub achha laga.

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  3. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

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