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बेहिसी

 अब दिल और धड़कता नहीं मेरा अब किसी से नज़रें मिलती नहीं  अब और चाहतें जागती नहीं मेरी  अब कहीं पर सुकून मिलता नहीं  अब शामें कटती नहीं किसी की यादों में और दिन गुज़रते नहीं किसी के पनाहों में  बस यूँ ही वक़्त बीतता जाता है और हम खर्च हुए जाते हैं उनकी यादों में अब ये दिल कमबख़्त कहीं जुड़ता नहीं  और दिल्लगी के लिए कुछ मिलता नहीं  जतन किए बहुत हमने शौक पालने के  पर ये बेज़ार मन कहीं लगता नहीं  बेबसी और बेहिसी के बीच ये बस पिसता रहता है और ज़िस्त इस जिस्म से रिसता रहता है अब सीने की धड़कन हमें शोर लगने लगी है  और सुकून भी हमसे ग़ैर-वाबस्ता रहता है